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एक आदत सी बन गई है तू
और आदत कभी नहीं जाती

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कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता
एक पत्थर तो तबीअत से उछालो यारो

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Bulati hai magar jaane ka nai
Ye duniya hai idhar jaane ka nai

Mere bete kisi se ishq kar
Magar had se gujar jaane ka nai

Sitare noch kar le jaaunga
Mein khali haath ghar jaane waala nai

Waba feli hui hai har taraf
Abhi maahol mar jaane ka nai

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मैं आख़िर कौन सा मौसम तुम्हारे नाम कर देता
यहाँ हर एक मौसम को गुज़र जाने की जल्दी थी

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दोस्ती जब किसी से की जाए
दुश्मनों की भी राय ली जाए

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न हम-सफ़र न किसी हम-नशीं से निकलेगा
हमारे पाँव का काँटा हमीं से निकलेगा

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अगर खिलाफ है होने दो जान थोड़ी है, ये सब धुआ है कोई आसमान थोड़ी है..।
लगेगी आग तो आएंगे घर कई ज़द मे, यहा पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है..।
हमारे मुँह से जो निकले वही सदाक़त है, हमारे मुँह मे तुम्हारी ज़ुबान थोड़ी है..।
मै जानता हू के दुश्मन भी कम नही लेकिन, हमारी तरह हथेली पे जान थोड़ी है..।
जो आज साहिब-ए-मसनंद है कल नही होगे, किरायेदार है जाती मकान थोड़े है..।
सभी का खून है शामिल यहां की मिट्टी में, किसी के बाप का हिन्दुस्तान थोड़ी है…।।

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किसने दस्तक दी, दिल पे, ये कौन है,
आप तो अन्दर हैं, बाहर कौन है।

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अंधेरे चारों तरफ़ साएँ साएँ करने लगे, चराग़ हाथ उठा कर दुआएँ करने लगे।
तरक़्क़ी कर गए बीमारियों के सौदागर, ये सब मरीज़ हैं जो अब दवाएँ करने लगे।
लहू-लुहान पड़ा था ज़मीं पर इक सूरज, परिंदे अपने परों से हवाएँ करने लगे।
ज़मीं पर आ गए आँखों से टूट कर आँसू, बुरी ख़बर है फ़रिश्ते ख़ताएँ करने लगे।।

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बीमार को मरज़ की दवा देनी चाहिए, मैं पीना चाहता हूँ पिला देनी चाहिए।
अल्लाह बरकतों से नवाज़ेगा इश्क़ में, है जितनी पूँजी पास लगा देनी चाहिए।
दिल भी किसी फ़क़ीर के हुजरे से कम नहीं, दुनिया यहीं पे ला के छुपा देनी चाहिए।
मैं ख़ुद भी करना चाहता हूँ अपना सामना, तुझ को भी अब नक़ाब उठा देनी चाहिए।।

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